उम्मीद हमसे है

रात को सुबह से उम्मीद है
और सुबह को सूरज से ।
सूरज को धरती से उम्मीद है
और धरती को प्रकृति से ।
प्रकृति को मनुष्य से उम्मीद है
और मनुष्य को समाज से ।
पर हम भूल गए है
कि उम्मीद हमसे है
न कि हम उम्मीद से ।
यह प्रकृति हमसे है ।
यह समाज हमसे है ।
हम है तो सब है ।
हम नहीं तो कुछ नही।

-Anshul Jain

 

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