एक कथा त्याग की

एक कथा त्याग की

एक त्याग की कथा सुनो, मेरे मन की व्यथा सुनो,
उस घर में किलकारियां सुनाती, मेरी आवाज हर मन को सुहाती,
पर मेरे पिता को अडिग कहिये, मेरे पिता को बेटा चाहिए,
वहाँ अग्नि जैसा श्रमण किया, अपनी खुशियों का त्याग किया,
जब थोड़ी बड़ी हुई , किताबो से मेरी गहरी दोस्ती हुई,
उन किताबो से थोडा दुःख बाट लेती, उन किताबों को अपना घर मान लेती,
पर एक दिन रसोई में रोटी को जला दिया, पिता के कहने पर पढाई को मैंने त्याग दिया,
फिर रसोई से ज़िंदगी बंधी हुई , शादी से ही कोई उम्मीद हुई,
सोचा पति है मेरा बड़ा समझदार , घर में हर चीज का बनाएगा साझेदार,
पर उम्मीद को उसने तोड़ दिया , फिर मेरा रिश्ता रसोई से ही जोड़ दिया,
कहा तुम जिंदगी में कच्ची हो , पर रसोई में बहुत अच्छी हो,
पति के लिए मैंने मेरे अरमानों को जला दिया, उसके लिए मैने अपने सम्मान को त्याग दिया,
सोचा उम्मीद को फिर जनूंगी , मै जब माँ बनूँगी,
पर ससुराल वालों ने कहा , तेरा सम्मान तभी होगा जब इस घर में बेटा होगा,
न जाने कितने मंदिर लेकर गये बेटे को पाने, पर अंत में मिली बेटी ही हाथ थामे,
ससुराल वालो ने बुराइयो से मुझे दाग दिया , मैंने अपनी हँसी को भी त्याग दिया,
पर जब मैंने देखा मेरी बेटी का हाल , कही हो न जाए उसका भी मेरे जैसा ज़िंदगी से सवाल,
तब मेरा डर भाग गया , मैंने मेरा ससुराल त्याग दिया,
बस अपनी बेटी की ज़िंदगी सवारने में लग गयी , और देखते ही देखते मेरी गुड़िया डॉक्टर बन गयी ।

-: अंशुल जैन :-

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