कचरे का अंबार

कचरे का अंबार

कचरे का अंबार

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चारों ओर तूने क्या हाल बना दिया ?
देखते ही देखते, कचरे का अंबार लगा दिया।

खुशबू की फ़िज़ाओं से महकाया था गुलशन को
मानव ने देखो, बदबू फैला दिया।

जानते हैं सभी, के ख़तरा मोल रहा है,
हर बार हाँ बार बार, प्रकर्ति से खेल रहा है
भाषण और काग़ज़ से दबी है ज़ुबान
जान कर खुद ज़हर पी रहा है।

जल , थल, वायु सब मटमैला कर दिया
बीमारियों से देखो घर भर गया
घर की सफाई कर बाहर फेंकता है
फिर रुमाल रखकर वही से गुजरता है।

अब न समझे तो कभी न समझ पाओगे
प्रकर्ति से खेले तो मौत ही पाओगे
मिटना है एक दिन, जानते हैं सब
हाल एहि रहा, तो वक़्त से पहले सिमट जाओगे
हाँ जी हाँ…
अब न समझे तो कभी न समझ पाओगे
प्रकर्ति से खेले तो मौत ही पाओगे

©️Nilofar Farooqui Tauseef
Fb, IG-writernilofar

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