कुछ ख्वाहिशें

कुछ ख्वाहिशें मेरी बर्फ के मकान सी
जैसे मस्जिद में गीता ,मंदिर में कुर-आन सी ।
ख्वाहिश फिर से रोने की,
माँ की गोदी सोने की।
ख्वाहिश ऐसी कि
बन बच्चा किलोल करता फिरूँ,
पापा की पीठ की सवारी करूँ।
दिल करता है यारों के संग,
बेफिक्री से विचरण करूँ।
ख्वाहिश कुछ कर दिखाने की,
बन परिंदा आसमान छू जाने की,
दरख्तों पर घर बनाने की,
ख्वाहिश ऊंचा उड़ जाने की
अधूरी है।
बात दिल की अधूरी है
बिन तेरे न दिन पूरा ,रात भी अधूरी है
तेरे मेरे बीच जो ये फांसला, ये जो दूरी है
मृग ढूंढ़ता कानन में,वो कस्तूरी है
तेरा आलिंगनी पीयूष पिउँ
मर रहा रोज ,जी करता फिर से जिऊँ
जो ये मेरी ख्वाहिश है न? वो अधूरी है ।
हो मुकम्मल ये ख्वाहिशें मेरी
कौनसा ये जरुरी है।
लाचारी ,बेवशी, हालात,परिस्तिथियां लाजमी है
जिंदगी में ।
अधूरी ख्वाहिशों की इक वजह मजबूरी भी है ।।
©सपन अग्रवाल

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