कुटुम्ब

मैं फिर उस कुटुम्ब की कामना करती हूँ
जहाँ मेरी माँ परियों वाली कहानी सुनाकर सुलाती थीं
जहाँ दादी उंगली पकड़कर पार्क में घुमाती थीं
जहाँ पापा जी मेरे कारण सर्वस्व समर्पण करते थे
जहाँ दादा जी हँसते हुए सब कुछ अर्पण करते थे
जहाँ कंधे पर बैठ कर मेले देखे जाते थे
जहाँ झोले में सामान खरीदे जाते थे
जहाँ मिट्टी के बर्तन में पकवान बनते थे
जहाँ उचित बात बोल कर सही इंसान बनते थे।।
मैं उस कुटुम्ब की कामना करती हूँ
जहाँ पुराने लोग मिल जुल कर रहते थे
जहाँ चचेरे ममेरे में फर्क नहीं करते थे
जहाँ प्रतिदिन त्योहार मनाया जाता था
जहाँ परमात्मा को अर्पित कर अन्न खाया जाता था
जहाँ भाई बहन में कोई अंतर नहीं होता था
जहाँ प्रयास करने पर समांतर नहीं होता था
जहाँ संयुक्ता एक ही होती थी
निपुणता एक ही होती थी।।

काश मैं भी वही कुटुम्ब बनाऊँ कि फिर आज मैं अपने कुटुम्बका गुण गाउँ।।

©️Ankita Virendra Shrivastava

काल का चक्रव्यूहघर की चौखटमैं समय हूंNews

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