खिड़की से एक सुहावना सफ़र

खिड़की से एक सुहावना सफ़र

 

खिड़की सुनतें ही,
जो पहली चीज़ याद आती हैं वो हैं: –
“खड़ग सिंह के खड़कने से खड़कती हैं खिड़कियां,
खिड़कियों के खड़कने से खड़कता हैं खड़ग सिंह!”
हाँ हाँ हाँ, क्या दिन थें वो,
सचमुच बचपन के दिन कितने हसीन थें!
वो खड़ग की जगह खड़-खड़ कहना,
और फिर ज़ोर-ज़ोर से हसना!
सिर्फ यही नहीं,
और भी कई सारी यादें हैं खिड़की से!
वो स्कूल बस में खिड़की पे बैठना,
वहाँ बैठने के लिए कि जाने वाली वो खट्टी-मिट्ठी नोक-झोक!
कहना के यह जगह मेरी हैं,
यहाँ मैंने पहले अपना रुमाल रखा था वगैरह-वगैरह!
वो सिट न मिलने पर,
बस के ड्राइवर अंकल को पटाना!
उनहें कहना कि यह मेरी जगह हैं,
यहाँ किसी और को न बैठने देंना!
और अगर कोई बैठ जाता,
तो स्कूल पहुंचने से पहले ही घर लौटने वाली हालत हो जाना!
वो गर्मियों की छुट्टियों में,
जब नानी के घर जातें!
तब भी उस खिड़की के पास वाली जगह को चुनना,
वो ठंडी हवाओं को अपने चेहरे पर महसूस करना!
आज भी याद हैं मुझे,
फिर माँ का चिंता में चिल्लाना!
अंदर आऔ कुछ हो न जाएं,
और फिर खुद ही खिड़की के पास बैठने की इज़ाज़त देना!
वो हम भाई-बहनों का,
जीभ दिखाकर एक-दुसरें को चिड़ाना!
फिर नानी के हवेली के जैसे बड़े घर में जाना,
और बड़ी-बड़ी खिड़कीयों को देखना!
पहले तो घबरा जाना,
फिर उन्हीं के पिछें छुपकर छुपन-छुपाई खेलना!
जब नानी के घर से जाना,
तब भी उन खिड़कियों पर हाथ फेरकर उनहें महसूस करना!
सारें रास्तें मायुस रहना,
कुछ न खाना, कुछ न पीना!
बस उन खिड़कियों के बारें में सोचते रहना,
गाड़ी की खिड़कियों के बाहर उन नज़ारों को मायुसी से देखते रहना!
पर फिर वो ट्रेन की खिड़की मिलने पर खुश हो जाना,
सारें रास्तें खुशी से खिड़की पर बैठकर अंताक्षरी खेलना!
आज भी याद हैं मुझे,
सचमुच बड़े प्यारें थें वो बचपन के दिन!
खिड़कीयों के आस-पास खेलते रहना,
और कभी-कभी थक्कर वहीं सो जाना!
सचमुच बड़े प्यारें थें वो दिन,
वो खिड़कियों के पास बिताना सारा दिन!

©दीपशीखा अग्रवाल!

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