Hindi Poetry

ख्वाहिश-ऐ-दरख्त

0 0
Read Time:1 Minute, 18 Second

बात ग़र ख्वाहिश की है तो चलो आज इत्तला करता हूँ तुम्हें
ज्यादा कुछ नहीं बस कुछ ख्वाहिशों का राज़ कहता हूँ तुम्हें

या मौला ये क्या हश्र किया उसका
ये तो नहीं था इंतकांँ उसका
हाँ पहले जी भर के इश्क किया उसने
फ़िर शायद जी ही भर गया उसका

अब जिंदगी की हर ख्वाहिश कुछ अधूरी सी है
जाने अनजाने में ये बात भी अनकही सी है
जान लो या ‘जान’ ही ले लोगे अब
अब तो बता दो कि ये दिल्लगी ही है

क्या क़ुसूर था उन सपनों का जो ख़ुद तुमने दिखाए थे
क्या क़ुसूर था उन शब्दों का जो तुमने ख़ुद सजाये थे
तेरे तहज़ीब-ऐ-तसव्वुर का क्या कहना ऐ दोस्त
उसी तहज़ीब से ही तो तूने ये दरख्त सजाये थे

अब बस कहते कहते थक गया हूँ तुम्हें
चलो आज फ़िर इत्तला करता हूँ तुम्हें…..

बात ग़र ख्वाहिश की है तो चलो आज इत्तला करता हूँ तुम्हें
ज्यादा कुछ नहीं बस कुछ ख्वाहिशों का राज़ कहता हूँ तुम्हें…

✍🏻Chhayank Mudgal ✍🏻

Also Read 

About Post Author

Sachin Gupta

Law graduated in 2019, Practicing as an advocate in Delhi. Presently, I want to post my ideas.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

Author

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

%d bloggers like this: