ख्वाहिश

ख्वाहिश-ऐ-दरख्त

बात ग़र ख्वाहिश की है तो चलो आज इत्तला करता हूँ तुम्हें
ज्यादा कुछ नहीं बस कुछ ख्वाहिशों का राज़ कहता हूँ तुम्हें

या मौला ये क्या हश्र किया उसका
ये तो नहीं था इंतकांँ उसका
हाँ पहले जी भर के इश्क किया उसने
फ़िर शायद जी ही भर गया उसका

अब जिंदगी की हर ख्वाहिश कुछ अधूरी सी है
जाने अनजाने में ये बात भी अनकही सी है
जान लो या ‘जान’ ही ले लोगे अब
अब तो बता दो कि ये दिल्लगी ही है

क्या क़ुसूर था उन सपनों का जो ख़ुद तुमने दिखाए थे
क्या क़ुसूर था उन शब्दों का जो तुमने ख़ुद सजाये थे
तेरे तहज़ीब-ऐ-तसव्वुर का क्या कहना ऐ दोस्त
उसी तहज़ीब से ही तो तूने ये दरख्त सजाये थे

अब बस कहते कहते थक गया हूँ तुम्हें
चलो आज फ़िर इत्तला करता हूँ तुम्हें…..

बात ग़र ख्वाहिश की है तो चलो आज इत्तला करता हूँ तुम्हें
ज्यादा कुछ नहीं बस कुछ ख्वाहिशों का राज़ कहता हूँ तुम्हें…

✍🏻Chhayank Mudgal ✍🏻

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