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गया मै भी वहां पर जा ना पाया

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गया मै भी वहां पर जा ना पाया
इच्छा मेरी निहित मिटा न पाया

दरखतों का जहां था रेत सा सूखा
पानी तो बहुत था प्यास बुझा न पाया

चाहता हूं एक जहां ऐसा भी हो
जाऊं वहां जहां कोई जा न पाया

आंखो मे हो हया मानवता रीझती हो
मिटा सकूं हर दर्द जो भुला न पाया

गया मै भी वहां पर जा ना पाया
इच्छा मेरी निहित मिटा न पाया

न वजह हो कोई झूठ की वहां पर
लगाऊं गले सूरज जो लगा न पाया

शीतलता फैली हो चंद्र की शीतल चांदनी सी
सहेजूं खुशियां मिटाकर गम, यादों को मिटा न पाया

डूब जाऊं जहां के इम्तिहान परवाह नहीं मुझको
एक बार तो पाऊं जहां वो जो पा न पाया

रहने को चाहिए जहां मुझे
बाकी किसी की परवाह नहीं
खुशनसीबी फ़ैल जाए दुनिया में इतनी
मुझे अपनी खुशी की परवाह नहीं
Raghav

 

About Post Author

Sachin Gupta

Law graduated in 2019, Practicing as an advocate in Delhi. Presently, I want to post my ideas.
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