गाँव में कुछ नामुराद

गाँव में कुछ नामुराद आए हैं..

गाँव मेरा ख़ुशहाल है, पवित्र है, कमाल है
यहां मेरे दादा, चाचा, और थोड़ा सा बवाल है
हम रोज़ सूरज की पहली किरण के गवाह हैं
यहां आपस में प्यार मोहब्बत बेपनाह हैं
यहां शहरों की तरह लोग जलते नहीं हैं
किसी को मरता देख ख़ुद सोते नहीं हैं
अरे यहां पर खेतों की तो छटा निराली है
इसी की फ़सलों से तो छाई खुशहाली है
वो सूरज के निकलने, छिपने का स्वर्णिम दृश्य
रोज़ सबके दुखों को जैसे कर देता है अदृश्य
वो रोज़ कुए से पानी लाना
घर को पावन मिट्टी से सजाना

यहां से डूबता सूरज सोने का कलश सा लगता है
खेतों से फसल का आना जैसे महोत्सव सा लगता है
यहां रोज़ शाम मोर-मोरनी अपना नाच दिखाते हैं
कभी कभी लुत्फ़ उठाने तो उनके मेहमान भी आते हैं

यहां तो आज भी दूध की नदी बहती है
असली भारत की छवि तो यहीं दिखती है
यहां के लोग सरल हैं, सहज हैं, सनातन हैं
सभी इक दूजे के लिए सर्व सुख आसन हैं
हिंदू हो या हो वो मोमिन यहाँ सब में भाईचारा है
शहर की महंगाई ने गाँव का किसान ही तो मारा है
हम रोज़ मर के शहरों को अन्न दान कर आए हैं
और ये कहते हैं कि ये ‘गँवार’ कहा से आए हैं

अब उन्हीं गँवारो की ज़मी में तुम चले आए हो
किसी वायरस से बचने यहां नज़र आए हो
तुम चिंता मत करो हम तुम्हें आज भी पनाह देंगे
तुम्हारे हर ताने को तुम्हारे दिल में निगाह देंगे

आज इस ज़लज़ले में हर शहर टूटा है
मगर मेरा गाँव रोज़ चैन की नींद सोता है
कुछ थे पैसे के प्यारे जो समंदर पार गए थे
लौटे वो एसे हैं जैसे कि सब कुछ हार गए थे
आज जब मौत इनके सर पर आ गयी है
बनकर के कोरोना इस दुनियाँ पे छा गयी है
तब इन नवाबों को घर की याद आ गयी है
पुछा तो कहा कि घर की मिट्टी खींच लायी है
अब इनकी दरिया दिली दरिया में मिल गयी है
ख़ून मे मिलकर इनकी रगों में भर गयी है

ये रोये हैं, सहमे हैं, भय से सकुचाये हैं
आज कुछ नामुराद मेरे गाँव आये हैं

आज कुछ नामुराद मेरे गाँव आये हैं…..

✍🏻 Chhayank Mudgal ✍🏻

Leave a Reply

%d bloggers like this: