गाँव

” गाँव ही अच्छा था यहाँ से तो ” अपनी छत पर खड़े राकेश के कानो में फुसफसाहट की आवाज़ आई , पास वाली छत पर खड़ा एक युगल बाते कर रहा था । बस गाँव का नाम बहुत था , उसे पुरानी यादो के समुद्र में गोता खिलाने के लिए और इस समय, जब सब जगह सन्नाटा पसरा हुआ था तब तो यादो के ज्वार उमड़ने जायज़ थे
गांव!! उसे याद आया की वो किस तरह भाग कर आया था अपनी तकदीर की तस्वीर बनाने इस शहर में , ऐसा नही था की उसके घर पर संसाधनों की कमी थी , बड़ा फार्म हाउस ,बड़ी जगह , खूब पैसा , अच्छा खासा नाम परिवार का लेकिन कुछ करने की तलब उसे शहर की ओर इस कदर ले आई की वो सदा के लिए अपने गांव से अलग हो गया । उसके दिमाग में गांव की तस्वीर साफ थी की “यहाँ इंसान परिवार के साथ ही रहकर जन्म से मरने तक का सफर तय करता है ” और उसे तो इन सब से घुटन होती थी , परिवार से घुटन होती थी उसे तो अपने और दोस्तों की तरह लैविश लाइफस्टाइल को जीना था शहर की । उसने अपने शुरुवाती दिनों में शहर की बहुत तारीफ की” यहाँ इतना सब कुछ है गाँव में कहाँ पड़ा है ये सब , इतनी आजादी किधर भी जाओ कैसे भी जियो कोई रोक टोक नही ” लेकिन धीरे धीरे वो अपने सपनो को अमलीजामा पहनाने में असफल रहा बस शहर ने उसको इस तरह जकड़ा की वो चाह कर भी इस पाश से निकल नही पाया ।
आज 5 साल होने को आये थे और इन पांच सालो में उसने गांव को 5 बार भी याद नही किया होगा लेकिन आज इस महामारी के समय उसे , उस युगल की बात में सहमती नज़र आ रही थी कि ” यहाँ से तो गाँव ही अच्छा था ”
©अनन्त_विश्व
विश्वजीत सिंह राठौड़

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