गांव और शहर

गांव और शहर

जिंदगी खफ़ा हैं आजकल लगता है कोई भुल हो गयी है,
गाँव से लाया था मिट्टी जो तावीज़ मे बांधकर- वो शहर आकर धुल हो गयी है…..
‘गाँव का वो मंजर आज भी मेरे खुन में
मिलता है,
गाँव का वो लाल गुलाब आज भी मेरे
दिल के बगीचे मे खिलता है’

– गाँव का नीला आसमान बेचकर मैनें शहर के काले बादल खरीदें हैं,
अपनी सच्ची पहचान छोड़कर- पढ़े मैनें झूठी शान के कसीदें हैं…..
‘गाँव का वो मंजर आज भी मेरे खुन में
मिलता है,
गाँव का वो लाल गुलाब आज भी मेरे
दिल के बगीचे मे खिलता है’

– रात के चाँद में भी अब वो अक्स नहीँ दिखता है,
गाँव का सीधा-साधा शक्स भी अब मुझसे नहीं मिलता है…..
‘गाँव का वो मंजर आज भी मेरे खुन में
मिलता है,
गाँव का वो लाल गुलाब आज भी मेरे
दिल के बगीचे मे खिलता है’

– गाँव मे सबसे छोटा था मैं- मैं सभी का प्यारा था,
मेरी हर ख्वाईश को उड़ान देने वाला- वो मेरे गाँव का चौबारा था…..
‘गाँव का वो मंजर आज भी मेरे खुन में
मिलता है,
गाँव का वो लाल गुलाब आज भी मेरे
दिल के बगीचे मे खिलता है’

– सालों बाद देखने गया जब उसे मैं- तो वो दरख्त अपनी आखरी बूँद आज़मा चुका था,
मिलने गया था चाव से मैं इतनी दूर- वो बचपन मुझसे दूर जा चुका था…..
‘गाँव का वो मंजर आज भी मेरे खुन में
मिलता है,
गाँव का वो लाल गुलाब आज भी मेरे
दिल के बगीचे मे खिलता है’
✍kabiryashhh✍

Leave a Reply

%d bloggers like this: