Hindi Poetry

जननी तू ही जीवनदायिनी

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कमलनयनी अनुरोध कर रहीं थीं,
उसके अश्रु मेरा दिल छलनी कर रहें थें।

उसके नेत्रों में जीने की तड़प थीं,
मगर सांसें उससे अपना दामन छुड़ा रहीं थीं।

मैं वहीं भौचक्की आंखों से उसे देखतीं रह गई,
और वो हंसते-हंसते गति मुक्ति पा गई।

वो मृगनयनी तो चलीं गई, मगर एक कसक जगा गई,
मेरे मन के अंधकार को चीरतें हुए उम्मीद की एक नई लौ जगा गई।

एक दीया उसने जलाया था मेरे मन का,
एक दीया खो गया था मैने अपनें आंगन का।

एक नई उम्मीद की रौशनी वो जगा गई,
मगरूर थीं वो मेरी माँ को मुझसे दूर ले गई।

खुले अंबर के नीचे सो गई वो,
अपनें साथ मेरी मुस्कान ले गई और मुझे मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दे गई।

हाँ माँ थीं वो मेरी जो स्वर्ग सीधार गई,
जीवन का पाठ पढ़ा मुझे एक नई चुनौती दे गई।

समझा गई औरत की गरीमा का पाठ,
साझा कर गई मेरे लिए हर सौगात।

हौंसलों की उड़ान भरने को प्रेरित कर गई,
मुझे मुझसे ही जीतते रहनें का एक नायाब ख़्वाब हक़ीक़त में परिवर्तित करने का जिम्मा सोंप गई।

धन्य हैं तू जगदंबा, धन्य हैं ऐ जननी,
जो अपनें अंतिम स्वासों को भी किसी ओर के नाम कर गई।

जन्म देतें वक्त एक नया जीवनदान हो तुम करतीं,
मगर कभी भी इसे एहसान की तरह नहीं हो जताती।

आज पंचतत्व साक्षी हैं एक माँ के बलिदान का,
आज ईश्वर भी झुकता हैं एक माँ के प्रेम के आगे।

नमन करले ऐ इंसान इस अनमोल सृजन का,
आभार व्यक्त करलें उस ईश्वर का के तूझे सानिध्य मिला मातृ प्रेम का।

हर रिश्ता सांझा करले भलें, माँ की ममता का कोई मोल नहीं,
चाहें कितने ही जन्म लेले तू इस उपकार का कोई तोल नहीं।

खुशकिस्मत हैं वो जिनके माँ होतीं हैं,
वरना जीवन में रिश्तेदार तो बहुत होतें हैं।

©दीपशीखा अग्रवाल!

 

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Sachin Gupta

Law graduated in 2019, Practicing as an advocate in Delhi. Presently, I want to post my ideas.
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