ज़िंदगी

ज़िंदगी

ज़िंदगी

किसी को तकलीफ़ हज़ार देती है,
तो किसी को खुशियाँ परोसती है ज़िंदगी।

माना कदम डगमगा जाते हैं अक्सर,
पर आगे बढ़ने से कहाँ रोकती हैं ज़िंदगी।

जो कहते हैं खुश रहा करो, उनसे पूछो,
क्यों खुश होने की कम वजह देती है ज़िंदगी।

रो लिया करो जब मन उदास हो,
क्योंकि आँसुओं में तकलीफ़ बहा लेती है ज़िंदगी।

किसी के लिये मोहब्बत लिखती है,
किसी के हक़ में दोस्ती रखती है ज़िंदगी।

जो साथ चल सके उम्र भर,
ऐसा कोई हमसफ़र ज़रूर देती है ज़िंदगी।

अपने ही उसूलों पे चलती रहती है,
किसी के दर पे कहाँ ठहरती है ज़िंदगी।

ख़्वाहिशें तो सब रखते हैं,पर सच बताओ,
महज़ ख़्वाहिशों से बनती है क्या ज़िंदगी।

– अंजली कश्यप
@scribbling_writer

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