जिंदगी एक गीत है

जिंदगी एक गीत है

जिंदगी एक गीत है
जिसे गुनगुना तो हर कोई रहा है
लेकिन शायद अपनी ही धुन में ।
एक ओर
जो इसे बिना लय और ताल के ,बेतरतीब ढंग से
उतार चढ़ाव से बेसुध हो लापरवाहों की तरह गा रहा है
दर-असल वो जिंदगी जी रहा है।
वहीँ दूसरी ओर
जो मुखड़े और अंतरे को बराबर ध्यान
में रखते हुए पंक्तियों को लयबद्धता से
उतार चढ़ाव के साथ सुर में सुर मिला कर गा रहा है न
वो दर-असल इस गीत को समझ पा रहा है
जिंदगी के मर्म को असली मायनों में समझ पा रहा है
जिसकी उड़ान अनंत है।
भ्रमित वो है जो सुन तो सब कुछ रहा है लेकिन वो न तो इस गीत को गा पा रहा और न ही गुनगुना पा रहा।
वो फंसा हुआ है सही और गलत के द्वन्द्व में ।
वो फंसा हुआ है “जिंदगी को समझा जाये या फिर जिया जाये” के बीच में ।।
मुखड़ा -अंतरा ,उतार-चढ़ाव, लय-ताल
सुर ये सब गीत रूपी जिंदगी के आडंबर ,सुख-दुःख
गम और खुशियां ,अनुभव और मजबूरियां हैं ।
जो इनके साथ सामंजस्य बिठा लेगा सच्चे अर्थों में वही इस गीत को अच्छे से सुन, सुना पायेगा ।
©सपन अग्रवाल

 

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