जिंदगी की परिक्षा…

Photo by Negative Space on Pexels.com

एक उम्र बीत जाती हैं जिंदगी की परिक्षा देते

एक उम्र बीत जाती हैं,
नाम कमातें, मान कमातें!
अपनों का जीवन संवारने में,
एक उम्र निकल जाती हैं!
जब तक कमाया,
खुब लुटाया!
अब करतें-करतें,
बुढ़ापा आया!
जिंदगी निकाली,
सबका किया!
तब जाकर यें,
खुशनुमा बुढ़ापा आया!
जाने क्या दिन थें वो,
मुंह से निकालने से पहले,
सबकुछ हाज़िर किया था कभी!
अब खट्तें-खट्तें,
दिल भर आया!
उम्र निकल जाती हैं,
इज्ज़त कमाने में!
एक फावड़ा, एक करची,
बस इतना ही था मेरे पास!
और आज देखों जीवन में,
कुछ भी ना खोया हैं!
बस उम्र निकल गई,
और बुढ़ापा आया हैं!
बुढ़ें हो गए तो क्या,
दिल तो आज भी ज़वान हैं!
बुढ़ापा आया हैं,
संग ढेर सारी खुशीयां लाया!
बच्चों का प्यार,
पोते-पोतीयों का सरकार!
एक भरा-पूरा परिवार,
खुशीयों से भरा मेरा सुखी संसार!
उम्र भर न रखी खवाहिश कोई,
बस करता रहा प्रयास कई!
जीता रहा उम्र भर अपनों के लिए,
अब मैं जीऊँगा अपने लिए!
आई हैं अब बारी मेरी,
मिलकर जीयेंगे उम्रभर!
बस बहुत हुआ सहना,
अब हैं खुलकर जीना!
उम्र निकल गई तो क्या,
अब भी आग बाकी हैं!
बस जीयेंगे खुलकर,
उम्र तो बस एक कहनें की बात हैं!
खुद भी हंसों और हंसाऔ,
उम्र तो बितनी हैं बीत ही जाती हैं जिंदगी की परिक्षाएं देने में!

©दीपशीखा अग्रवाल!

Authors

Leave a Reply

%d bloggers like this: