परिवार

हां वो ही परिवार था

आंखें खुली थी मध्दम-मध्दम,
मध्दम उंगली हिलती थी
दो जने घर में दिखते, जो मेरा संसार था।

कुछ बड़ा हुआ, कुछ होश लिया कभी जगता था,

कभी सो लिया ना दिल पर कोई वार था ।

कुछ और बढ़ा, चलना सीखा गिरते पड़ते, बढ़ना सीखा
गिरने से मेरे जो अक्सर, गिरता कई – कई बार था।

स्कूटर से स्कूल में जाना
मां की गोद में वापस आना
आकर घर में उधम मचाना, ही खुशियों का सार था।

वो कॉलेज के दिनों की मस्ती
कोई फिकर ना दिल में बसती
पिता के ही कंधों पर तब तो घर का सारा भार था।

वो पहली जॉब की खुशी मनाना
वीकेंड्स में घूमने जाना
जीता हुआ महसूस कराया,
ना लगा कभी मुझे हार था।
हां वो ही परिवार था

NAMAN KUMAAR JAIN
@ naman9203

ऐसा परिवार अब कहाँकुटुम्बकाल का चक्रव्यूहNews

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