प्रकृति की रचना

प्रभु की वन्दना करते, भिन्न-भिन्न चीज़ो के ढंग,,
रंग आसमान का प्रियतम-सा, जैसे धूसर गौ रंग।।

परिदृश्य रचा, बसा, छँटा हुआ- सारे काम निष्ठा से पकड़ा हुआ,,
देखने पर सुख की अनुभूति होती है- प्रकृति की ममता भी माँ जैसी होती है।।

हो सवार कर्तव्य रथ पर- चली प्रकृती मानवता के पथ पर,,
निर्मल, निर्दोष निर्मल आनंद का रूप है- प्रकृति प्रभु के अद्भूत परमानंद का ही तो स्वरूप है।।

धीमे-सहज, खारे-मीठे- अनेकानेक है इस संसार के अंग हैं ,,
मैं प्रकृति के बलिहारी जाऊँ- जो जीवन-मरण रहती संग हैं।।

भोजन हो या भजन हो ये प्रकृति का ही तो हिस्सा है- मौला की अनुभूति कराती है प्रकृति यही जीवन का हिस्सा है ,,
प्रकृति की रक्षा करो- करो बचाने का दावा – मैं भी आऊँ तुम भी आओ करो इस संभालने का वादा।।

✍kabiryashhh✍

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