यह प्रकृति

प्रकृति ही आकृति

यह प्रकृति आकृति है ।
मन की , विचारों की , भावों की
भरोसे की, प्यार की और अधिकार की
यह सुंदर बागान सजाती है
प्यासे तक पानी पहुंचाती है
यह प्रकृति आकृति है ।
जैसा भी सोचो वैसा बन जाती है
ऊँचे पहाड़, गहरे समंदर
सब मन में उतारती है
जीने की तमन्ना जगाती है
यह प्रकृति आकृति है ।
शब्दो की, सच्चाइयों की
एक सेवक को लेखक बनाती है
अंधेर में शब्दों के दीपक जलाती है
चुप्पी को आवाज दे जाती है
यह प्रकृति आकृति है ।
धूप में छाँव पहुंचाती है
सूखे में बारिश लाती हैं
हर जीव का घर बनाती है
अकेले का सहारा भी बन जाती है
यह प्रकृति आकृति है ।
आवाज है उनकी जो अब तक चुप्प थे
दर्द है ये उन जख्मों का जो अब तक नासूर थे
ज्ञान है ये कि इस धरती पर हर जीव का अधिकार है
न मानो तो अँधेरा और मानो तो प्रकाश सी गुलजार है
यह प्रकृति आकृति है ।

-: अंशुल जैन :-

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