फर्ज़

फर्ज़

फर्ज़

हमें अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी बोझ लगती हैं,
उनको निभाने में हमें हर्ज होता है,
सोचो कैसे वो कंधे कभी नहीं झुकते,
जिनपे पूरे मुल्क का फ़र्ज़ होता है।

जन्म बेशक नहीं देती वो मगर,
अपने सीने पे पाँव रख, चलना सिखाती है।
सुकून कितना है उसके लिए मर मिटने में,
ये एक फौजी की शहादत दिखाती है।

हम तो हर लम्हा अपने हिसाब से जीते हैं,
उन्हें शायद ही उनके मन की चीजें भी मिलती होंगी।
सोचो दहशत का क्या आलम होता होगा,
जब दोनों ही ओर अनगिनत लाशें गिरती होंगी।

जब शरहद से किसी की शहादत की ख़बर आती है,
तो वो अखबारों और समाचारों में नवाब हो जाते हैं।
उस शहादत की कीमत कोई उस माँ से पूछो,
जिसके सारे अरमान, अब महज़ ख़्वाब हो जाते हैं।

वो पिता जो अपने बेटे को कन्धा देता है,
उसका पूरा आसमान ज़मीं पे होता है।
वो गर्व से सर भले ही ऊँचा रखता हो,
पर अंदर ही अंदर बिलख के रोता है।

किसी के सिर का साया,
किसी के बुढ़ापे का सहारा।
किसी के लिए बेगरज़ यार,
किसी के लिये जश्न-ए-बहारा।

‘हम जल्दी ही फिर मिलेंगे’ ,
ये हम सभी के लिये महज़ एक वादा है।
इसमें कितना दर्द है, ये उस फौजी से पूछो,
जिसे मालूम ही नहीं कि तकदीर का क्या इरादा है।

-अंजली कश्यप
@scribbling_writer

फर्ज़

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