बेइंतेहाँ मोहब्बत

तुझसे होकर अलग,न तन्हा मैं रह पाया था,
दोस्तो से मुलाक़ात पर तू,याद हर बार आया था।

सौ बात बनायी थी सब ने,दस मुझे भी सुनाया था,
वाक़िफ़ था तुझसे क़रीब से,यक़ीन न मुझको आया था।

तुझे पूछा और तलाश किया,फिर अँधेरों में मैं खोया था
तेरी एक-एक यादों में मैं,सिसक-सिसक कर रोया था।

तुझे खोकर बड़ी मुश्किल से,मैंने तुझे भुलाया था,
मैं झूठा था,दिल को बुद्धू यूँ ही बनाया था।

तू आया वापस,तो तुझे फिर से अपनाया है,
फिर से मरि आत्मा को,तेरे लिए जिलाया है।

तेरी खुशी के लिए फिर से,तुझसे मैं जुड़ूगा,
जानता हुँ,फिर से,टुटूँगा,बिखरूँगा।

आधे हो तुम मेरे,और आधे ही रहोगे,
जाओगे मुझे छोड़कर,एक दिन रूलाओगे।

तेरा हूँ मैं सदा,और तेरा ही रहूँगा,
न किसी को अपनाया,न अपना ही सकूँगा।

करना ही है अलग,तो मेरी सुध क्यूँ लेता है
सह न पाऊँगा ख़ुदा,तू दर्द-ए-ग़म क्यूँ देता है।

तू मोहब्बत है ग़ैर का,ये लफ़्ज़ गर सुन लेता हूँ,
विकल हो जाऊँ वहीं पर,मैं फूट कर रो देता हूँ।

तुझे खोने के मात्र ख़्याल से,मैं खौफ़ खाता हूँ,
तू होगा कभी किसी ग़ैर का,फिर भी मै तुझसे बेइंतेहाँ मोहब्बत करता हुँ।

©उज्ज्वल शुक्ला

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इंतज़ार खामोशी अहसास

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