मंजिल…

एक आग दबी है सीने में
एक पैरों तले है जल रही
है खा़क होने को हौसला
पर मंज़िल अभी है भींच रही।

वो लौ आश की बुझ ही गयी
पर चिंगारी अभी है सुलग रही
है मृत शैया पर वक्त मेरा
पर मंज़िल अभी है खींच रही।

वो व्यंग्य बाण भी बेध गयी
वो तीक्ष्ण त्राण को सेंध गयी
ज़ख़्मों से देह है रक्त तप्त
पर मंजिल अभी भी सींच रही।

मल रज मस्तक,किया मातृ प्रणाम
तब आत्मा निठुर है बोल गयी
तम को तन से तू दूर भगा
ये मंजिल तेरी पहचान रही।

बाहु में बल भी तब आया
गिरि से जा जब मैं टकराया
ताडंव तड़ित भी खौल उठा
तब पथ मंजिल का बोल उठा-

“है शूरवीर गंभीर धरा का तू एक अनुपम चेहरा,
भय त्याग,अडिग तू चलता रह,मंजिल तेरा,नव स्वर्ण सवेरा है।”

-उज्ज्वल शुक्ला

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