मुझे भी घर जाना है

मालूम सबको है मगर,
एक कशमकश में खोए रहते हैं।
कि कोई खींच रहा उनको,
फिर भी सोये रहते हैं।।
मतलब की भीड़ में,
सब खुद में ही रहते हैं।
अजनबी से लगते हैं अब,
सब अब्तर से रहते हैं।।
समाज का ये बदलाब,
एलान है मेरी जंग का।
ये पता नहीं आरम्भ है,
या आगाज़ है अंत का।।
शफ़क नहीं किसी का,
अश्क़िया जमाना है।
कब अंत होगा सफ़र का,
अब मुझे भी घर जाना है।।

By-Yogesh Sharma

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