Hindi Poetry

मुलाक़ात अधूरी है साहब

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अब तो दरिया-ऎ-इश्क में मुलाक़ात की आरज़ू है
तेरे इश्क़ में दूर तलक बह जाने की आरज़ू है
तेरी मोहब्बत में पागल सा हो गया हूं ऐ सनम
अब इसी मोहब्बत में गुज़र जाने की आरज़ू है

इक अरसा हो गया है अब तुझसे मिले हुए
यूँ हँसकर घुलमिल कर मुलाक़ात किए हुए
ये बात सुनने में कुछ अज़ीब ज़रुर है मगर
अब याद करता हूँ बिन तुझे याद किए हुए

बातों-बातों मे अब ग़म भी छुपा लेता हूं मैं
आरज़ू-ए-वफा की हसरत मिटा लेता हूँ मैं
उसकी बेरुखी अब सहन नहीं होती ऐ दोस्त
तो अब उन यादों को लिखकर जला देता हूँ मैं

उन दिनों की तो बातें ही सताया करती हैं
जैसे अब ये रातें मुझको रुलाया करती हैं
अब मुलाक़ातों की तो बात नहीं करता मैं
ये अफ़वाह अब दुनिया उड़ाया करती है

तू जानती थी कि तुझे कितना मानते थे हम
और फ़िर इक दूजे को कितना चाहते थे हम
क्या एक अफ़वाह से टूट गए वो सारे धागे
जिन्हें कच्चे रेशम नहीं कुतुबमीनार मानते थे हम

तो अब मुलाक़ातों को छोड़ कर ऊँची उड़ानों की आरज़ू है
ऐ सनम तेरे इश्क़ में दूर तलक बह जाने की आरज़ू है…….

✍🏻 Chhayank Mudgal ✍🏻

पिता एक नायक

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मुलाक़ात अधूरी है साहब

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Sachin Gupta

Law graduated in 2019, Practicing as an advocate in Delhi. Presently, I want to post my ideas.
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