मेरे सपनों का घर

मेरे सपनों का घर

मेरे सपनों का घर कैसा हो?
मेरे बचपन के यादों के घरोंदें जैसा हो!
यह पत्थर का मकां था कभी,
अब यादों का घरोंदा हैं मेरा!
एक बंजर भूमि पर मकान बनाया था हमने,
जो एक विरान महल सा लगता था हमें!
सोचते थे कैसे रहेंगे इस अंजाने से मकान में,
और अब यादों का घरोंदा हैं हमारा!
इस मकां में कभी, विरान हवाएँ चलतीं थी,
शाम होतें ही सब अंदर चले जाया करते थें!
अब धीरे-धीरे यें घर बनने लगा हैं हमारा,
तब वहाँ पंछी गाने लगे थें,गाय चरते लगे थें!
दादी की लोड़ीया गुंजतने लगी थीं,
दादाजी घोड़ा बनने लगे थें!
पहले एक पत्थर का मकान था,
अब यादों का घरोंदा हैं हमारा!
पहले वो महज़ एक मकान था,
अब यादों का घरोंदा हैं मेरा!
बहुत याद आतें हैं आज भी,
उस घर में बिताए हुए बचपन के वो पल!
कभी माटी से खेलते हुए पकड़ा जाना,
तो कभी भाई-बहन की गलती की दांट खुद खाना!
याद हैं मुझे, यह मकां महज़ मकां नहीं,
अब यादों का घरोंदा हैं मेरा!
इस मकां में कभी,मेंने बचपन बिताया था अपना,
महज़ पत्थर के एक मकान से घर बन गया था वो हमारा!
इस तरह से हमने उस मकान को,
एक यादों के घरोंदे में बदला था हमनें!
वो मकान महज़ मकान नहीं,
अब यादों का घरोंदा हैं हमारा!
और मेरे सपनों का घर भी मैं ऐसा ही चाहतीं हूँ!

©दीपशीखा अग्रवाल!

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