Hindi Poetry

मैं एक मुसाफिर

0 0
Read Time:44 Second

मैं एक मुसाफिर

आज खडा है तु अपने द्वार पर
तुझे क्या कोई समझेगा
तु बस एक जलता दिया है
तुझे हर कोइ मुसाफिर समझेगा ।

अगर फैल जाए तु विश्व मे
तुझे हर कोइ प्रकाश समझेगा ।

ये बारिश लिए तुझे रोकेंगे
पर क्या कोई तुझे समझेगा
तुझमे सूर्य सा तेज है
बादल तुझे कब तक रोकेगा ।

जो खडा हुआ तु निश्चय कर
तो हिमालय भी तुझे निहारेगा
अब राही नहीं तु इस भूमि पर
सारा विश्व तुझे अंगीकार करेगा ।

-अंशुल जैन

Also Read…

About Post Author

Sachin Gupta

Law graduated in 2019, Practicing as an advocate in Delhi. Presently, I want to post my ideas.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

Author

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

%d bloggers like this: