मैं एक मुसाफिर

मैं एक मुसाफिर

मैं एक मुसाफिर

आज खडा है तु अपने द्वार पर
तुझे क्या कोई समझेगा
तु बस एक जलता दिया है
तुझे हर कोइ मुसाफिर समझेगा ।

अगर फैल जाए तु विश्व मे
तुझे हर कोइ प्रकाश समझेगा ।

ये बारिश लिए तुझे रोकेंगे
पर क्या कोई तुझे समझेगा
तुझमे सूर्य सा तेज है
बादल तुझे कब तक रोकेगा ।

जो खडा हुआ तु निश्चय कर
तो हिमालय भी तुझे निहारेगा
अब राही नहीं तु इस भूमि पर
सारा विश्व तुझे अंगीकार करेगा ।

-अंशुल जैन

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