मैं दर्द देता, तू खुशियां लेती

मैं दर्द देता, तू खुशियां लेती।

ये कैसी अँधेरी दुनिया है,
जहाँ मैं क़ैद हूँ?
अच्छा-अच्छा तो मैं अभी,
अपने माँ के गर्भ में हूँ।
जहाँ अभी मेरे अँगों का,
निर्माण हो रहा है,
मुझे इस दुनिया में,
लाने के लिए सज किया जा रहा है।

ये बाहर की दुनिया,
कितनी प्यारी होगी ना?
रोशनी होगी,
नए-नए लोग होंगे,
मुझे बहुत सारा प्यार देंगे,
मेरी इस दुनिया से पहचान कराएँगे।

अरे-अरे ये माँ को क्या हो रहा है?
उन्हें इतना दर्द क्यों हो रहा है?
माँ तुम इतना क्यों चिल्ला रही हो, इतना क्यों रो रही हो?

ये आदमी कौन है?
माँ यह आपको दर्द दे रहा है।
माँ क्यों कुछ बोल नहीं रही?

अरे ये तुम क्या बोल रहे?
मैं माँ को दर्द दे रहा हूँ?
मेरी वजह से माँ को दर्द हो रहा है?

माँ मैं कभी तुझसे यह नहीं बोल पाऊँगा,
तेरे समक्ष अपने भाव ना रख
पाऊँगा,
मन मेरा तुझे दर्द में देख होता है उदास,
सोचने लगता हूँ गर्भ में कि क्यों लगाई तूने मुझसे आस,
कि तेरे सारे दुख हर पाऊँगा,
तुझे मैं ढेरों खुशियाँ दे पाऊँगा?
जब अभी ही इतना दर्द दे रहा हूँ,
दुनिया में आने, मैं तुझे कष्ट दे रहा हूँ।

जानता हूँ,
सुन मेरी बात तू बस यही कहेगी कि मुझसे तू है,
तो दर्द कैसा,
पर तुझे थोड़े भी दर्द में देख,
सहम जाता हूँ, डरे हुए बच्चे जैसा।

माँ मेरा अस्तित्व तुझसे है,
मेरे जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा, मेरा हर किस्सा तुझ से है।

मैं आँख, तो मेरी आँखों का नूर हो तुम।
मैं सजदा, तो मेरा खुदा हो तुम।
मैं नदी, तो मेरा बहाव हो तुम।
मैं आफताब, तो मेरा प्रकाश हो तुम।
मैं चाँद, तो मेरी चाँदनी हो तुम।
मेरी ज़िन्दगी के ज़र्रे-ज़र्रे में हो तुम।

माँ मैं तुझसे बस एक ही बात कहना चाहता हूँ,
मेरा जीवन मैं तेरे लिए सजाता
हूँ,
तुझसे निर्मित, मैं तुझे समर्पित होता हूँ,
मेरा ज़र्रा जर्रा तुझ पर अर्पित करता हूँ।

मैं दर्द देता, तू खुशियां लेती

©️रूपेश गुप्ता
/silentpoetrytrails

Entry No. THG013

Date: 23rd Oct 2020

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