Hindi Poetry

मैं देखता हूं

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मैं देखता हूं चांद को बादलों में खुद को छिपाते हुए,
मैं देखता हूं रात को खामोशी से दर्द बताते हुए।
मैं सुनता हूँ बेमौसम बरसात को अपना राग गाते हुए,
मैं सुनता हूँ हवा को एक दर्दीली धुन बजाते हुए।।
माहौल बडा ही गमजदा सा है,
मैं देखता हूं अंज को नील पर अपना हक जताते हुए।।
मैं देखता हूं पहर को पल पल कर जाते हुए।।
मैं देखता हूं बारिश को थमते हुए,
मैं देखता हूँ फ़िर एक कहानी बनते हुए।
मैं देखता बूंदों को बेजान शाखों से छनते हुए,
मैं देखता हूँ बसर में अरमान जगते हुए।।
मैं देखता हूँ एक उम्मीद से रात के बादल छटते हुए।।

  • Yogesh Sharma

सपनों की दुनिया

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Sachin Gupta

Law graduated in 2019, Practicing as an advocate in Delhi. Presently, I want to post my ideas.
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