मोहजाल में फंसी राधिका

मोहजाल में फंसी राधिका

मोहजाल में फंसी राधिका,
कृष्ण को जग‌ भर में ढुंढे।

कृष्ण के पीछे भागे,
बस कृष्ण कृष्ण की ही माला जपे।

मोहन तो ठिठोली करें,
राधे को परेशान करें।

ना जाने सत्य – असत्य,
बस कृष्ण कृष्ण का‌ ही नाम जपे।

लागे कान्हा‌ एक महान और प्यारी,
बाकी दुनिया तुच्छ लगें।

खुद ही ना‌ जाने क्या वो चाहें,
खुद ही ना‌ जाने क्यों वो चाहें।

भय की बाधा दूर हो गई,
मोह रूपी बाधा संग अब भेंट हुई।

जग का मोह छुट गया,
बस कृष्ण रंग एक राधिका पर चढ़ गया।

सुध-बुध खो मोहन रंग जाई,
सुध-बुध खो अब‌ राधिका तो जग से भी बिसराई।

मोहन मोह का बंधन तोड़े,
राधा रानी तो मोह को ही प्रेम समझे।

ना जाने कृष्ण लीला,
बस रंगी उसके रंग में और करें प्रेम रासलीला।

जग से बैरी हुई,
जब से कृष्ण मोह से मित्रता भई।

मोह बंधन में बंधी राधिका,
बस कृष्ण कृष्ण करें राधिका।

मोहजाल में फंसी राधिका,
बस एक कृष्ण को ही अपना माने राधिका।

मोह जाल में फंसी राधिका,
अपने अंदर समाए कृष्ण को सारे जग में हैं ढुंढ रहीं।

मोह जाल में फंसी राधिका,
मोह को ही प्रेम समझ रहीं।

नहीं समझती बात कृष्ण की,
कृष्ण के खातिर कृष्ण से ही लड़ रहीं।

अपने तो सब मगर,
राधिका केवल कृष्ण को ही एक अपना मान रहीं।

मोहजाल में फंसी राधिका,
बस कान्हा को ही एक अपना मान रहीं।

मोह जाल में फंसी राधिका,
अपनी सुध-बुध ही खो‌ बैठी हैं राधिका।

कृष्ण तो समझाना‌ चाहें,
मगर वृषभान दुलारी को तो कुछ भी समझ नहीं आए।

©️दीपशिखा अग्रवाल!

 

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