Desires

यह ख्वाइशे ज़िंदा है

यह जीती है, मरती है
बाते करती, चलती फिरती है,
हर रोज सांस लेती,
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

यह मन को छूकर भागती है
बारिश से भिगाती है
ओस सी मन के हर कोने में फैलती है
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

पेड़ो की तरह इनकी भी जड़ें है
समय के साथ, इनकी भी शाखें बनती और टूटती है
यह भी मन के बागान सजाती है
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

बचपन की तरह ये चंचल भी है
और लड़कपन की तरह जिद्दी भी
और बुढ़ापे की तरह सहारा भी ढूंढती है
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

-: अंशुल जैन :

 

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