Hindi Poetry

यह ख्वाइशे ज़िंदा है

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यह जीती है, मरती है
बाते करती, चलती फिरती है,
हर रोज सांस लेती,
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

यह मन को छूकर भागती है
बारिश से भिगाती है
ओस सी मन के हर कोने में फैलती है
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

पेड़ो की तरह इनकी भी जड़ें है
समय के साथ, इनकी भी शाखें बनती और टूटती है
यह भी मन के बागान सजाती है
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

बचपन की तरह ये चंचल भी है
और लड़कपन की तरह जिद्दी भी
और बुढ़ापे की तरह सहारा भी ढूंढती है
यह ख्वाइशे ज़िंदा है

-: अंशुल जैन :

 

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About Post Author

Sachin Gupta

Law graduated in 2019, Practicing as an advocate in Delhi. Presently, I want to post my ideas.
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