यु तो माँ, तुम अब बोलती नहीं

यु तो माँ, तुम अब बोलती नहीं,
पर मेरे दिल के इलावा तुम्हारी और कोई जगह नहीं,
सुबह सुबह उठ जाता हूँ, तुम्हारे ख्याल से,
सोया रहता हूँ आँखे खोले, कुछ इस प्रकार से,
इंतजार करता रहता हूँ, पर क्यों तुम डाँटती नहीं,
यु तो माँ, तुम अब बोलती नहीं ।
मेरा टिफ़िन तो अब भी लगता है,
पर अब, मैं खाता नहीं,
सोचता हूँ, इसी बहाने से तुम मुझे डाँटने आओगी,
पर ये इंतज़ार कभी मिटता नही,
यु तो माँ, तुम अब बोलती नहीं ।
अक्सर पिताजी मुझे मेरे इस व्यवहार के लिए डाँटते है,
पर ये नन्ही सी शाखा, पेड़ की जड़े ही तलाशते है,
पर जब तुम मिलती नहीं, तो भिखर जाता है ये मन टूट कर,
वैसे भी टूटे कांच के टुकड़े कभी जुड़ते नहीं,
यु तो माँ, तुम अब बोलती नहीं ।
रोज सोते समय तुम्हारी कहानियो को याद जरूर करता हूँ,
उन पुरानी यादो को हर समय सहेजता हूँ,
पर समय के साथ धुंदली यादो में तुम अब साफ़ दिखती नहीं,
तो खुद को कोसते हुए रोता हूँ, पर फिर भी तुम आती नहीं,
यु तो माँ, तुम अब बोलती नहीं ।
याद तो तुम भी मुझे करती ही होगी,
नहीं तो ये सांस चलती नहीं,
बस भगवान से ये ही पूछता हूँ, की वो इतना निर्दयी कैसे है,
की एक माँ और बेटे की तडपती चीख वो सुनते नहीं,
यु तो माँ, तुम अब बोलती नहीं ।

-: अंशुल जैन :-

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