राधा

राधा

राधा

मंत्रमुग्ध करती कर कमलो को,
अर्पण कर अपना शृंगार,
बलखाती बेलो सी चंचल,
लायी वो प्रेम का उपहार।

मृग से सुन्दर नैना जिसके,
मानो शृष्टी का हो सार,
बातो में जो बल है उसके,
आगे फीके है तलवार।

पता ठिकाना कोई न जाने,
बसती है कान्हा के मन में ,
पावन प्रेम की धारा बनके,
बहती है वृन्दावन में।

यमुना के तट बैठी होगी,
तकते राह वो कान्हा की,
जग ढूँढे भी न मिलेगी,
प्रियसी कोई राधा सी।

-अंजली कश्यप

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