रूठी हुई नज़्म

रूठी हुई नज़्म को चलो आज दवा बनाते हैं,
रुकी हुई ज़िन्दगी को फिर से जान दिलाते हैं,
कुछ आग लगाते हैं, कुछ आग लगाते हैं।

रुक जा अभी देख हम कैसे आगे जाते हैं,
कलम से अपनी आज ज़हर बहाते हैं,
कुछ आग लगाते हैं, कुछ आग लगाते हैं।

लफ़्ज़ों के ज़रिए पुराना इतिहास जगाते हैं,
अश्कों से उस बेवफा को ज़रा आवाज़ लगाते हैं,
कुछ आग लगाते हैं, कुछ आग लगाते हैं।

तन्हाई में कुछ और ज़ख़्म सुलगाते हैं,
उस बेवफा की चलो कहानी बताते हैं,
कुछ आग लगाते हैं, कुछ आग लगाते हैं।

अपने शब्दों को फिर से जगाते हैं,
तन्हाई में कलम का साथ अपनाते हैं।
कुछ आग लगाते हैं, कुछ आग लगाते हैं।

कुछ अपने रूठे हैं उनको मनाते हैं।
हम बिछड़ गए थे खुद से तो अब,
खुद को ज़रा आइना दिखाते हैं,
कुछ आग लगाते हैं, कुछ आग लगाते हैं।

है जो मशाल मेरे दिल में उसमें आज चिंगारी लाते हैं,
रूठी हुई नज़्म को चलो आज दवा बनाते हैं।
कुछ आग लगाते हैं, कुछ आग लगाते हैं।

रूठी हुई नज़्म

©️Subhankar Joshi

 

Entry No. THG011

Date: 20th Oct 2020

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