सुनो माँ

सुनो माँ

माँ से कीए कई वादे भी तो हैं-
उस से जुड़ी कई यादें भी तो हैं,
यूँ तो खो जाऊँ इस दुनियाँ की भीड़ मे मैं– मुझे बचाके रखने वाली उसकी फरियादें भी तो हैं…..

]कोई परेशानी मेरे निकट हो-
या कोई बात जो विकट हो,
मैं माँ को ही खोजता बेहाल आतुर-सा– माँ गले लगा लेती मुझे देख अपना लाल व्याकुल-सा…..

मैं हो जाऊँ कभी उम्र मे बड़ा या हो
जाऊँ कभी अबोध बालक-
मेरे हर तर्क को समझती है और देखती
है मेरे हर नाटक,
तुझसे बिछड़कर माँ- अब रहूँ भी तो कहां रहूँ मैं– तू ही तो खुदा है मेरी- अब माँ कहुँ भी तो कहुँ किसे मैं…..

तेरे निष्पाप अधरों से मेरा नाम लेना हो-
या अपने चुंबन से कभी मुझे इनाम देना
हो,
माँ तेरे आँचल को पकड़ कर- मैं एक शहंशाह बन जाता हूँ– सिमट जाता हूँ तेरी गोद में- और चैन की नीन्द सो जाता हूँ …..

माँ तू वक़्त वक़्त पर मुझे आवाज देती
रहा कर-
मैं अक्सर दुनियाँ की राहों में खो जाता
हूँ,
देखता हूँ तेरी भोली सुरत की तरफ मैं– और फ़िर से नया हो जाता हूँ…..
✍kabiryashhh✍

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