हकीकत

हकीकत जीने की चाह में इंतज़ार किया बहुत
हुआ नहीं मुकम्मल हमने बस सपना ही जिया,

कहने को तेरे लिए रुके थे हम बड़े वक्त तक,
ढूँढा खुद में खुद को ,इंतज़ार अपना ही किया।

फूल चुनने की चाह में कांटो से उलझ गए,
फिर संभाला खुद को फ़टे कपड़ों को सिया।

भीड़ में जब हम खोने की कगार पर थे,
भूल गए खुद को तो नाम तेरा ही लिया।

हमारी रगों में खूँ बनके दौड़ता रहा नाम तेरा,
बेवफा भी न थे तुम, पर ये सिला क्यों दिया।

बड़े हिसाब से नाजुक सलीके से पाला गया हमें,
सहने की आदत न थी, फिर भी ये ग़म पिया।

कभी पास न आना तुम चाहते हो,हम ज़िंदा रहे
इल्ज़ाम तुम्हारे सर लगेगा ,कि मैं बहुत कम जिया।।
✍✍Mohit Tiwari

 

मुझे भी घर जाना है

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