ख़तरा

ख़तरा

ख़तरा

इंसानों की वजह से इंसानियत अब ख़तरे में है,
जहाँ देखों वहाँ अत्यचार हो रहा है,

कहीं भ्रष्टाचार, जालसाजी , रेप और अनेकों उत्पीड़न हर रोज हो रहे है,
लोग इनको सुनकर अनसुना सा कर देते है,

जो आवाज भी उठाता है तो उसे पैसों की ताकत या धमकियों से दबा दिया जाता है,
या हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया जाता है,

इंसान तो क्या लोग जानवर को भी नहीं बक्श रहे है,
आये दिन रोज नए कत्ल-ए-आम हो रहे है,

लालच लोगों के दिलों में घर कर गयी है,
ईर्ष्या कहें या जलन इसकी आग से हर कोई जल रहा है,

और जल कर ख़ुद के साथ दुसरो को ख़ाक कर रहा है,
उसको अपनी खुशी में खुशी नहीं होती,

बल्कि दूसरों के दुःख और कष्ट देखकर उसे ख़ुशी मिलती है,
पता नहीं लोगों को सताकर लोग कैसे सुकून पाते है,

नारीयों के साथ हो रहें अनेकों अट्टाचार का जिम्मेदार न जानें कौन कौन है,
कभी कभी कुछ नारी ही नारी की स्वयं दुश्मन है जो उसे शिक्षा से रोकती है,

आगे बढ़ने का मार्ग रोकती है,
अशिक्षा से लोग अपने जीवन का महत्व नहीं जान पाएंगे,

कहीं गरीबी है तो कही लाचारी फिर कैसे अपने देश को भविष्य में विशाल बनाएंगे,
किसी के पास खाने को रोटी नहीं,

तो कोई महलों में आराम से सो रहा है,
क्या कुछ नहीं कर सकता था वो,

मग़र अब इसकी जिम्मेदारी भी हर एक आम इंसान को उठानी होगी,
मदद जहाँ हो मुक़म्मल उसे वहाँ पहुँचानी होंगी,

ख़ुद की बुराइयों से लड़कर पहले खुद को स्वच्छ बनाना होगा,
फिर समाज की स्वच्छता की जिम्मेदारी भी उठानी होगी,

नारियों को उचित सम्मान एवं हक भी दिलाना होगा,
उनकी सुरक्षा का भार प्रत्येक व्यक्ति को फ़र्ज़ समझकर निभाना होगा,

बेहतर कल के सपने के लिए हमे आज का वर्तमान सही बनाना होंगा।

ख़तरा

✒️Alok Santosh Rathaur
@ehsaas_ki_awaaz

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