परिवार

परिवार

हां वो ही परिवार था

आंखें खुली थी मध्दम-मध्दम,
मध्दम उंगली हिलती थी
दो जने घर में दिखते, जो मेरा संसार था।

कुछ बड़ा हुआ, कुछ होश लिया कभी जगता था,

कभी सो लिया ना दिल पर कोई वार था ।

कुछ और बढ़ा, चलना सीखा गिरते पड़ते, बढ़ना सीखा
गिरने से मेरे जो अक्सर, गिरता कई – कई बार था।

स्कूटर से स्कूल में जाना
मां की गोद में वापस आना
आकर घर में उधम मचाना, ही खुशियों का सार था।

वो कॉलेज के दिनों की मस्ती
कोई फिकर ना दिल में बसती
पिता के ही कंधों पर तब तो घर का सारा भार था।

वो पहली जॉब की खुशी मनाना
वीकेंड्स में घूमने जाना
जीता हुआ महसूस कराया,
ना लगा कभी मुझे हार था।
हां वो ही परिवार था

NAMAN KUMAAR JAIN
@ naman9203

ऐसा परिवार अब कहाँकुटुम्बकाल का चक्रव्यूहNews

ऐसा परिवार अब कहाँ

ऐसा परिवार अब कहाँ

ऐसा परिवार अब कहाँ

वो भी क्या ज़माना था।
एंटीना चारों तरफ घुमाना था।
छत पे चढ़कर, बाबा चिल्लाते थे
ठीक हुआ या नही, दोहराते थे
हम भी चिल्ला – चिल्ला कर
हाँ या नही बताते थे।
महाभारत, श्रीकृष्ण और चित्रहार
था एक टिवी पर लगता था देख रहा पूरा संसार
दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची या मामा-मामी
देखते थे सब एक साथ रंगोली या मोगली

वक़्त क्या ऐसा बदला बदल गयी सब तस्वीर
फ़िज़ा बदली घर बदला बदल गयी तक़दीर
रिमोट के झगड़े भाई-बहन के बीच सिमट गई
वक़्त के हाथों, फूल सारे एक गमले में लिपट गयी
हम-तुम और टीवी ही घर में रह गए
जो थे रिश्ते सारे वो कहीं बह गए

जो दिल चाहिए हर पल सब टीवी पे मिल जाता है
जो मज़ा पहले आता था, अब कहाँ आता है
जो मज़ा पहले आता था, अब कहाँ आता है

ऐसा परिवार अब कहाँ

©️Nilofar Farooqui Tauseef
Fb, IG-writernilofar

कुटुम्बकाल का चक्रव्यूहघर की चौखटNews

कुटुम्ब

कुटुम्ब

मैं फिर उस कुटुम्ब की कामना करती हूँ
जहाँ मेरी माँ परियों वाली कहानी सुनाकर सुलाती थीं
जहाँ दादी उंगली पकड़कर पार्क में घुमाती थीं
जहाँ पापा जी मेरे कारण सर्वस्व समर्पण करते थे
जहाँ दादा जी हँसते हुए सब कुछ अर्पण करते थे
जहाँ कंधे पर बैठ कर मेले देखे जाते थे
जहाँ झोले में सामान खरीदे जाते थे
जहाँ मिट्टी के बर्तन में पकवान बनते थे
जहाँ उचित बात बोल कर सही इंसान बनते थे।।
मैं उस कुटुम्ब की कामना करती हूँ
जहाँ पुराने लोग मिल जुल कर रहते थे
जहाँ चचेरे ममेरे में फर्क नहीं करते थे
जहाँ प्रतिदिन त्योहार मनाया जाता था
जहाँ परमात्मा को अर्पित कर अन्न खाया जाता था
जहाँ भाई बहन में कोई अंतर नहीं होता था
जहाँ प्रयास करने पर समांतर नहीं होता था
जहाँ संयुक्ता एक ही होती थी
निपुणता एक ही होती थी।।

काश मैं भी वही कुटुम्ब बनाऊँ कि फिर आज मैं अपने कुटुम्बका गुण गाउँ।।

©️Ankita Virendra Shrivastava

काल का चक्रव्यूहघर की चौखटमैं समय हूंNews

काल का चक्रव्यूह

काल का चक्रव्यूह

काल का चक्रव्यूह
बचपन के मासूमियत में कैसा उतावलापन आया
काल का सार मुझमें ऐसा समाया
समय बदल गया और मैं रोना भूल गया
एक समय आया जब मेरा बचपन शरारत भरा साथ पाया
मेरे साथ रहा मेरे माता पिता का साया
लगा जैसे शैतानियों का हुज़ूम मुझमें समाया
रेत की तरह समय बीत गया
मैं युवा हुआ और मिला काम का रीत गया
जीवन के चक्रव्यूह में समय का काल था
युवावस्था में जिम्मेदारियों का मायाजाल था
माहौल था बुरी संगतों का बुरी विपदाओं का आगाज़ था
वक्त बीता यौवन का वो आपदाओं का रिवाज़ था
अब वृद्ध हो चला हूँ उन्नति के पथ पर
अब पीछे एक ज़माना है
अब पीढ़ियों को लिखा पढ़ा कर पंचतत्व में विलीन हो जाना है।।

©️Ankita Virendra Shrivastava IG ankitavshrivas

घर की चौखटमैं समय हूंविषय शून्यNews

घर की चौखट

घर की चौखट

अब सुबह चिड़िया घर की चौखट पर आती है,
सुबह की भोर में सूरज का प्रकाश घर के आँगन में आता है,
अब हर रोज सब साथ मिलकर बैठते है,
हर शाम अब सभी लोग आँगन की हवा एक साथ लेते है,
वातावरण भी अब काफ़ी खुशमिजाज लगता है,
शाम को अपने घर जाती हुई चिड़ियों का झुंड आसमान में दिखता है,
शाम को अब आसमान में विभिन्न एक समान रंग दिखते है,
चाँद, तारों और हवा का सब मिल अब आंनद लेते है ,
परिवार के सभी लोग अब एक दूजे को वक़्त देते है,
गंगा, यमुना की जलधारा भी अब पहले से स्वच्छ लगती है,
प्रदूषण का अब नामोनिशान सा मिटता हुआ लगता है,
अब छत पर सभी पड़ोसी अपने आँगन में नज़र आते है,
दोस्त, रिश्तेदार अब फोन पर हालचाल पूछते है,
सुबह, शाम सब साथ मिल रामायण, महाभारत देखते है,
किचिन में अब सब साथ मिल पकवान बनाते है,
रात में सब मिलकर खाना भी खाते है,
बच्चे और बड़े लूडो में साथ सारा दिन लगे रहते है,
अब छत पर हर रोज़ सबके संग खेल होते है,
देखों अब दूसरों के घर न मिलकर भी लोग दिलों के करीब होने लगें है,
अब परिवार के सभी लोग एक दूसरे पर ध्यान रख ख़्याल करते है,
प्रकृति भी अब ख़ुद को संभाल पा रहीं है,
बस अब कुछ लोग है जो विषैले पदार्थ बनाकर,
अपना और पृथ्वी के विनाश के मार्ग बना रहे है,
हमें एक साथ मिलकर सबका साथ देना होगा,
पृथ्वी को प्रदूषण मुक्त बनाना ही होगा,
यह इंसान अब और कितनी गलतियां और करेगा,
गर जो गलतियों को न सुधारा तो स्वयं सहित पूरी सृष्टि के विनाश का कारण होगा ।

– आलोक कुमार राठौर
@Ehsaas_Ki_Awaaz

मैं समय हूंआईनापृथ्वी माँNews

Time is the limit

Time is the limit

Time is the Limit,

Time Wakes me up- Time sleeps me down,
Time shows me the real me- With The dusk and The dawn.

 A stitch in time saves nine
These rapid red veins they all are mine,
Time takes me to all the shelves of hidden success- I follow that path with all the best acts.

– Time is the mate of all those nightingale tones when awake-
Those sweet memories that are still to be made.
Time likes the way I perform the daily pledged shows- With all my might and those voices that I follow.

Time is the limit…
He waits for none- Time will introduce himself as he is the only one.

Time is the limit…
He challenges you to enter the world rage,
You can’t win that buddy as he is the witty riddle and you are only a minimal phrase.

✍kabiryashhh (Yash Sharma)✍

Insta- @kabiryashhh @poets_nation

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Time oh Time

Time oh Time

Time oh time!
How is it possible,
That you are always here
still not mine?

TimeohTime!
Just to save you, I spend you.
And hence In all this, I end you.
I left laziness, so very less I slept,
Still see Life says, “you have no time left.”

TimeohTime!
How is it possible,
That you are always here
still not mine?

TimeohTime!
I quit playing to read,
as a kid.
In teenager turned face from the crush,
thinking let pass this time which is worse.
Whole life I struggled to make Time Mine,
Still, now I rhyme
TimeohTime!
You are here,
But I am not left with time…..

©️Dr Ritu Dhankhar ✍🏼 जिंदगी
Instagram: @lifeisawesome_rd

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मैं समय हूं

मैं समय हूं

मैंने दक्ष के द्वारा होते, सती का अपमान देखा है ।
मैंने एक मां के द्वारा होते, ध्रुव का तिरस्कार देखा है।
मैंने समुद्र मंथन से विष निकलते और अमृत बंटते देखा है।
मैंने पिता के द्वारा होते, पहलाद पर अत्याचार देखा है।
मैं समय हूं ।

मैंने त्रेता युग में, दशरथ का पुत्र वियोग देखा है,
मैंने सीता की अग्निपरीक्षा होते देखा है।
मैंने द्वापर युग में, भीष्म की प्रतिज्ञा,
द्रौपदी का चीर हरण देखा है।
मैं समय हूं।

मैंने बुद्ध का मोह माया से त्याग देखा है।
मैंने साईं का विश्वास देखा है।
मैंने रज़िया को बनते सुल्तान देखा है।
मैंने लक्ष्मी बाई का बलिदान देखा है।
मैं समय हूं ।

मैंने देश को होते गुलाम देखा है।
मैंने आजाद की निडरता देख,
भगत को फांसी चढ़ते देखा है।
मैंने भारत को होते, आज़ाद देखा है।
मैंने राष्ट्रपिता गांधी को छल से मरते देखा है।
मैं समय हूं।

मैंने प्राचीन युग देखा है,
मैं आधुनिक युग देख रहा हूं
मैं समय हूं।

मैंने कल्पना की उड़ान देखी है।
मैंने मंगल पर यान देखा है।
मेरे निर्भया कांड देखा है।
मैंने जवानों को शहीद होते देखा है।
मैं समय हूं।

मैंने प्रकृति का तांडव देखा है।
केदारनाथ में प्रलय देख,
मैंने 2020 का कोरोना काल देखा है।
मैं समय हूं।

मैं समय हूं,
मैंने बहुत कुछ देखा है।
देख मैं और क्या-क्या देखूंगा।

मैं समय हूं।
मुझसे ना कोई आगे निकल पाता है
और न मुझ में कोई पीछे लौट पाता है
जो साथ-साथ चलता मेरे,
वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाता है
मैं समय हूं।
मैं समय हूं।

Original name – Pratishtha Dixit
Pen name – Simran
Insta I’d – @quote_shyri_point
@simplicity_luvs_simran

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