कुटुम्ब

कुटुम्ब

मैं फिर उस कुटुम्ब की कामना करती हूँ
जहाँ मेरी माँ परियों वाली कहानी सुनाकर सुलाती थीं
जहाँ दादी उंगली पकड़कर पार्क में घुमाती थीं
जहाँ पापा जी मेरे कारण सर्वस्व समर्पण करते थे
जहाँ दादा जी हँसते हुए सब कुछ अर्पण करते थे
जहाँ कंधे पर बैठ कर मेले देखे जाते थे
जहाँ झोले में सामान खरीदे जाते थे
जहाँ मिट्टी के बर्तन में पकवान बनते थे
जहाँ उचित बात बोल कर सही इंसान बनते थे।।
मैं उस कुटुम्ब की कामना करती हूँ
जहाँ पुराने लोग मिल जुल कर रहते थे
जहाँ चचेरे ममेरे में फर्क नहीं करते थे
जहाँ प्रतिदिन त्योहार मनाया जाता था
जहाँ परमात्मा को अर्पित कर अन्न खाया जाता था
जहाँ भाई बहन में कोई अंतर नहीं होता था
जहाँ प्रयास करने पर समांतर नहीं होता था
जहाँ संयुक्ता एक ही होती थी
निपुणता एक ही होती थी।।

काश मैं भी वही कुटुम्ब बनाऊँ कि फिर आज मैं अपने कुटुम्बका गुण गाउँ।।

©️Ankita Virendra Shrivastava

काल का चक्रव्यूहघर की चौखटमैं समय हूंNews

सफ़र की कहानी

सफ़र की कहानी

 

सफ़र सी चल रही है जिन्दगी–कोई तो आकर इसे थाम लो,
गुमनाम सा चल रहा हूँ इस शहर में–कोई तो आकर मेरा नाम लो…

की निकलता हूँ घर से– तो कई वादे मेरे साथ निकलते है,
सफ़र थोड़ा कठिन है मेरा– फ़िर भी मेरे साथ चलते हैं…
राह में अक्सर यूँ ठहर के– मैं हर बार सोच मे पड़ जाता हूँ,
देखता हूँ की हालात मेरे जमीर के–और फ़िर से राह मे निकल जाता हूँ…

ये जो सफ़र की समझाईश है– हर किसी की इसमे पैदाइश हैं,
जिन्दगीं-हुनर-पैसा-शोहरत ये सब सफ़र के हिस्से हैं– जिस महफिल में भी तुम जाओ सब जगह इसके किस्से हैं…

सफ़र सा चल रहा है ये शहर– ना जाने ये रुकेगा कब,
छांव में बैठा शक्स यही सोचे– की कड़ी धुप में कहां गये सब…

✍kabiryashhh✍

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खिड़की से एक सुहावना सफ़र