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कुटुम्ब

मैं फिर उस कुटुम्ब की कामना करती हूँ जहाँ मेरी माँ परियों वाली कहानी सुनाकर सुलाती थीं जहाँ दादी उंगली पकड़कर पार्क में घुमाती थीं जहाँ पापा जी मेरे कारण...