काल का चक्रव्यूह

काल का चक्रव्यूह

काल का चक्रव्यूह
बचपन के मासूमियत में कैसा उतावलापन आया
काल का सार मुझमें ऐसा समाया
समय बदल गया और मैं रोना भूल गया
एक समय आया जब मेरा बचपन शरारत भरा साथ पाया
मेरे साथ रहा मेरे माता पिता का साया
लगा जैसे शैतानियों का हुज़ूम मुझमें समाया
रेत की तरह समय बीत गया
मैं युवा हुआ और मिला काम का रीत गया
जीवन के चक्रव्यूह में समय का काल था
युवावस्था में जिम्मेदारियों का मायाजाल था
माहौल था बुरी संगतों का बुरी विपदाओं का आगाज़ था
वक्त बीता यौवन का वो आपदाओं का रिवाज़ था
अब वृद्ध हो चला हूँ उन्नति के पथ पर
अब पीछे एक ज़माना है
अब पीढ़ियों को लिखा पढ़ा कर पंचतत्व में विलीन हो जाना है।।

©️Ankita Virendra Shrivastava IG ankitavshrivas

घर की चौखटमैं समय हूंविषय शून्यNews

विषय शून्य

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विधा कविता

शून्य ही है ज़िन्दगी में शून्य से मुलाकात है
मैं अनंत अवतरण मेरी शून्य से ही बात है
शून्य से शुरुआत है और शून्य ही तो अंत है
शून्य ही है ज़िन्दगी और
शून्य ही अनंत है।।

शून्य परिधि का सूचक शून्य ही उदार है
लाखों की गडणा का शून्य ही आधार है।।

शून्य मुझमें है कभी वो शून्य ही विद्यमान है
शून्य को ही सोचकर आर्यभट्ट बनता महान है।।

शून्य का है मोल नहीं और शून्य ही अनमोल है
शून्य ही गिनती का सूचक शून्य ही तो मोल है।।

शून्य मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा राज़ है
शून्य ही दुनिया मेरी करोड़ों का रिवाज़ है।।

शून्य ही ले जाता उन्नति पर शून्य ही तो आस है
दस बीस बनता शून्य से
शून्य करोड़ों की आवाज़ है।।

©️Ankita Virendra Shrivastava IG ankitavshrivas

Ayodhya Uttar Pradesh

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बारिशज़िंदगीमाँ की परवाह-News Updates