ग़रीबी

ग़रीबी

ग़रीबी

दुख और सुख के रास्ते है।
कोई न किसी के वास्ते हैं।
राहों में पड़े हैं पत्थर यहाँ,
ठोकर खाकर भी है चलना यहाँ।
जीत उसी की जो कर ले मुट्ठी में ज़माना
ज़िन्दगी एक ग़रीबी सफर है सुहाना।
कभी है हकीकत, कभी है फसाना।

बादल घिर आते हैं
खुशी गम में अपने पहचाने जाते है।
अमीरी और ग़रीबी के सिक्के है
किसी की किस्मत में तारे तो किसी के धक्के है
फिर भी झूम कर दिल गाये ये तराना
ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना।
कभी है हकीकत, कभी है फसाना।

©️Nilofar Farooqui Tauseef
Fb, ig-writernilofar

Also Read

दोस्तीकुछ अंशपरिवारNews

Travelling through Feminine

Travelling through Feminine

From the unbearable Labor
Pain- to the unconditional
Maternal gain,
The travelers of the Feminine
Certifies the strength-
The travelers of the Feminine
Justifies the faith length….

From the heights of the Pure
Love- To the affection of the
Marital Dove,
The travelers of the Feminine
Gains the beauty-
The travelers of the Feminine
Performs the fluty….

From the tiny toddler on the
Chest- To the careful nymph
at the her best,
The travelers of the Feminine
Shows the lovely sparkle-
The travelers of the Feminine
Grows in trickles….

From making a man perfect-
To the protection of all wrath,
The travelers of the Feminine
Takes the challenges-
The travelers of the Feminine
Fakes the revenges….

✍kabiryashhh ✍
Insta- @kabiryashhh

Post No. THG003

Thee Amor me…Click Here for Read

सफ़र

सफ़र

“बोझ बस्ते का हो या ज़िम्मेदारीयों का,भारी होता है।”

कहने के लिए यह मात्र एक पंक्ति है अपितु अगर ग़ौर करें तो सार्वभौमिक सत्य को समेटे हुआ है।
एक उम्र गुज़रती है बिना किसी चिन्ता के,खुशीयों एवं मस्ती-मज़ाक,खेल-कूद,दौड़ा-भागी या सीधे शब्दों में कहूँ तो……….
बचपन की गोंद में।

बचपन जिसमें समाहित होती है मनुष्य के जीवन की अलौकिक स्मृतियाँ,जिनके स्मरण मात्र से हृदय प्रफुल्लित हो उठता है,होंठो पर सन्तुष्टि की मुस्कान शोभायमान हो जाती है एवं ललाट ज़िम्मजदारियों की रेखा से परे उर्वशी के सौन्दर्य के समान चमक उठता हैं।
दो पल के लिए ही सही पर वह इसांन सब कुछ भूल कर उस सुकून की अनुभूति करता हैं,
जिसे उसने बीताये थे सालों पहले,माँ के लाड-प्यार और लोरियों,दादी की परियों की कहानीयों,बहनो से लड़ाईयों एवं दोस्तों के संग खेल-खिलौनों मे।

उस बचपन के गुज़रते-गुज़रते बस्ते का बोझ बढ़ता चला जाता है।जिस पीठ पर बाबा के दुलार की थपकियां पड़ती थी,जिस कन्धें पर छोटे भाई को बिठाकर खिलाया था,वो स्कूल के बस्ते के भार के नीचे दबता चला जाता है।

बाल्यकाल………
जिसमें हृदय की कोमलता,निर्मलता एवं निश्चल स्वभाव एवं चित्त को मोह लेने वाला अप्रीतम सौन्दर्य विराजमान होता है,जिसकी एक झलक मात्र से सारा तनाव तिमिर में विलुप्त-सा हो जाता है।
धीरे-धीरे उम्र बढ़ती जाती है,बस्ते के भार से दबती जिन्दगी कब जिम्मेदारियों का भारी भरकम बोझ उठाने लगती है,एहसास ही नहीं होता।

जो बालक संन्ध्या कालीन माँ के आँचल में लिपट कर सो जाया करता था,वो आज आजीविका के लिए रात-रात भर कल-कारखानों में पसीना बहाता है या गणित के सूत्रों से मशक्कत करता हुआ आंग्ल भाषा सीखता,चार बाय छ: के कमरे में रजनी के उजियाले के सुकून से दूर एक छोटे से लैम्प की रौशनी में,हृदय में तमाम आशायें एवं उम्मीदें लिए सिमट जाता हैं।

नज़रिया एवं संकल्प…..हाँ,
यही शब्द है जो इस ज़िम्मेदारियों के बोझ को उठाने की,परेशानीयों से लड़ने की और तमाम मुसीबतों के सम्मुख विशाल पर्वत के समान वक्षस्थल ताने,निर्भीक,अख्खड़ एवं अडिग रहने की हिम्मत और जुनून से लबरेज़ कर देता है।जिसके कारण ये बोझ नहीं बस मंज़िल तक जाने की एक सीढ़ी लगती है,जिस परीक्षा में बिना उत्तीर्ण हुए,ये खुदा भी मेरी मदद नहीं करेगा।

सच ही कहा गया है,भगवान भी उसी की मदद करता है,जो स्वयं की मदद करना जानता है।
हालांकि भाग्य और भविष्य पर मेरा विश्वास नहीं तथापि इतना जानता हुँ कि यदि दशरथ माँझी पहाड़ तोड़ सकते है,मैरीकाॅम माँ की ज़िम्मेदारी निभाकर भी विश्वविजेता बन सकती है तो मैं क्यूँ नहीं,फिर क्यूँ न देगा भाग्य साथ और क्यूँ न बनेगा भविष्य।

अब मग में काटें लाख भी आये,
पग में छाले क्यूँ न पड़ जाए,
न रूका हूँ,न रूकूँगा,न डरा हूँ,न डरूँगा।
मैं चला हूँ तो चलूँगा,बढ़ा हूँ,बढूँगा।

-उज्ज्वल शुक्ला

तुझे लिखना तो चाह रहा हूँ पर लिख नही पा रहा हूँ…..

‘सफर ‘

सफर

सफर, सूखी नदियां, बंजर पहाड़ ,बिन पत्तों के नंगे दरख़्त और बिना परिंदों का आसमान ।

कहते है हर सफ़र हसीं होता है

लेकिन मेरा मन विचलित है इस सफर में ।

माँ की दुआएं,पापा का विश्वास ,जेहन में कुछ कर दिखने का संकल्प, वैसे तो सब कुछ साथ है मेरे

लेकिन कमी है संकल्प में दृढ़ता की,

कमी है आत्मविश्वास की ।

मेरा मन विचलित है इस सफ़र में ।

written by:- sapan agrawal

insta handle :-sapan_writes

©सपन अग्रवाल

माँ तू ही सब कुछ हैं

Blog for Technical